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Showing posts from October, 2026

प्रेरक प्रसंग - 2

शिक्षक का पेशा बहुत पवित्र तथा ईमानदारी वाला होता है! आज का प्रेरक प्रसंग उन सभी शिक्षकों को समर्पित है जो अपना सबकुछ त्यागकर देश के भविष्य को संवारने में लगे हैं। एक बार बाल गंगाधर अपने कुछ मित्रों के साथ बात कर रहे थे। उन दिनों उन्होंने वकालत पास की थी। एक मित्र बोला, ‘तिलक, वकालत तो तुमने पास कर ली है। किंतु आगे के लिए क्या सोचा है? क्या अब सरकारी नौकरी करोगे याकिसी कोर्ट कचहरी में वकालत?’ मित्र की बात सुनकर तिलक बोले,’अब तुमने पूछ ही लिया है तो सुन लो। मुझे ऐसे पैसे की जरूरत नहीं जो मुझे सरकार का गुलाम बना कर रखे। मैं ऐसी वकालत नहीं करना चाहता जहां दिन में कई बार झूठ बोलना पड़े।’  बात आई-गई हो गई। सभी अपने-अपने कामों में लग गए। एक दिन उनकी मित्र-मंडली को पता चला कि बाल गंगाधर ने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया है।तनख्खाह है तीस रुपए महीना।यह सुनकर उस मित्र को सबसे ज्यादा आश्चर्य हुआ जिसने कुछ समय पूर्व उनका मन जानना चाहा था। वह सीधे तिलक के पास जा पहुंचा और बोला, ‘यह तुमने क्या किया तिलक? वकालत की डिग्री लेकर अध्यापक क्यों बने? क्या तुम शिक्षकों की आर्थिक स्थिति के बा...

प्रेरक प्रसंग -1

अप्रत्याशित सफलताओं का आधार प्रचंड मनोबल एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वट वृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा शुरू हुयी और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया – “भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी मात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधन सम्पन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसका क्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के कर्म अवरोध बन कर खड़े हो जाते हैं?” ‘नहीं’ बुद्ध ने समझाते हुए कहा, और एक प्रेरक कथा सुनाने लगे – “विराट् नगर के राजा सुकीर्ति के पास लौहशांग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहशांग को इस तरह प्रशिक्षित किया था कि वह युद्ध कला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहशांग जब अपनी क्रुद्धावस्था में प्रचण्ड हुँकार भरता हुआ शत्रु सेनाओं में घुसता था तो देखते ही देखते विपक्षियों के पाँव उखड़ जाते थे। धीरे-धीरे समय से साथ जिस तरह जन्म के बाद सभी प्राणियों को युवा और जराव...

हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा

हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा जब भी खुलेगी चमकेगा तारा कभी ना ढले जो, वो ही सितारा दिशा जिस से पहचाने संसार सारा    हथेली पे रेखायें हैं सब अधूरी किसने लिखी हैं नहीं जानना है सुलझाने उनको न आएगा कोई समझना हैं, उनको ये अपना करम है अपने करम से दिखाना है सबको खुद का पनपना, उभरना है खुदको अँधेरा मिटाए जो नन्हा शरारा दिशा जिस से पहचाने संसार सारा हमारे पीछे कोई आए ना आए हमें ही तो पहले पहुचना वहाँ है जिन पर हैं चलना नई पीढ़ीयों को उन ही रास्तों को बनाना हमें हैं जो भी साथ आये उन्हें साथ ले ले अगर ना कोई साथ दे तो अकेले सुलगा के खुद को मिटा ले अँधेरा दिशा जिस से पहचाने संसार सारा