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Showing posts from September, 2026

नहीं सूर्य से कहता कोई

नहीं सूर्य से कहता कोई धूप यहाँ पर मत फैलाओ, कोई नहीं चाँद से कहता उठा चाँदनी को ले जाओ। कोई नहीं हवा से कहता खबरदार जो अंदर आई, बादल से कहता कब कोई क्यों जलधार यहाँ बरसाई? फिर क्यों हमसे भैया कहते यहाँ न आओ, भागो जाओ, अम्मा कहती हैं, घर-भर में खेल-खिलौने मत फैलाओ। पापा कहते बाहर खेलो, खबरदार जो अंदर आए, हम पर ही सबका बस चलता जो चाहे वह डाँट बताए। - निरंकार देव सेवक

एक शरीर में कितने दो हैं

एक शरीर में कितने दो हैं? गिन के देखो कितने दो हैं? देखने वाली आँखें दो हैं उनके ऊपर भौहें दो हैं सूंघते हैं खुशबू जिनसे नाक तो इक है, नथुने दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन बोलने वाले होंठ तो दो हैं लाखों आवाज़ें हैं सुनते जिनसे सुनने वाले कान तो दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं कान भी दो, आंखें भी दो दाएं बाएं कंधे भी दो हैं दो बांहें, दो कुहनियां उनकी हाथ भी दो, अंगूठे भी तो दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं दो हाथों की दो हैं कलाइयाँ टाँगे दो हैं, घुटने दो हैं चलना, फिरना, उठना, बैठना दो पैरों के टखने दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं पैरों के नीचे दो तलवे हैं भागूं जिनसे एड़ियाँ दो हैं बंद हो तो मुट्ठी हो जाये खोलू गर हथेलियाँ दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं अरे, भूल गया था, मार तमाचा मेरे मुंह पे गाल भी दो हैं दोनों पहलू झांक के देखो झांकने के भी बगलें दो हैं एक शरीर में कितने दो हैं कितने सारे  दो हैं फिर भी इक ही दिल है, इक ही जान है एक ही आकाश और एक ही सूरज, इक जमीं, एक हिन्दुस्तां है। — गुलज़ार

पर्वत कहता शीश उठाकर

 पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ। सागर कहता है लहराकर, मन में गहराई लाओ। समझ रहे हो क्या कहती हैं उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग भर लो भर लो अपने दिल में मीठी-मीठी मृदुल उमंग! । पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो कितना ही हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार!  – सोहनलाल द्विवेदी 

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है मन का विश्वास रगों में साहस भरता है चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती — सोहनलाल द्विवेदी 

बसंती हवा

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ! वही हाँ, वही जो युगों से गगन को बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए हूँ; हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ। वही हाँ, वही जो धरा का बसंती सुसंगीत मीठा गुँजाती फिरी हूँ; हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ। वही हाँ, वही जो सभी प्राणियों को पिला प्रेम-आसव जिलाए हुए हूँ, हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ। क़सम रूप की है, क़सम प्रेम की है, क़सम इस हृदय की, सुनो बात मेरी— अनोखी हवा हूँ, बड़ी बावली हूँ! बड़ी मस्तमौला, नहीं कुछ फ़िकर है, बड़ी ही निडर हूँ, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ, मुसाफ़िर अजब हूँ! न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी, न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ! हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ। जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं, शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं, हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ। चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया, गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू’ उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुँची— वहाँ गेहुँओं में लहर ख़ूब मारी, पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक ...

माँ, कह एक कहानी

"माँ, कह एक कहानी !" "बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी ?" "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी ? कह माँ, कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी ? राजा था या रानी,  माँ, कह एक कहानी ।" "तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी ।" "जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ, यही कहानी ।" "वर्ण-वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिन्दु झिले थे, हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी ।" "लहराता था पानी! हाँ, हाँ, यही कहानी ।" "गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से, गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्ष की हानी !" "हुई पक्ष की हानी ? करुणा-भरी कहानी !" "चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया । इतने में आखेटक आया, लक्ष्य-सिद्धि का मानी ।" "लक्ष्य-सिद्धि का मानी! कोमल-कठिन कहानी ।" "माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी । तब उसने, जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी ।" "हठ करने की ठनी! अब बढ़ चली कहानी ।" ...

चाँद का कुर्ता

 हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला । सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ । आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का, न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का । बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`, कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने । जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ, एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ । कभी एक अँगुल भर चौड़ा, कभी एक फ़ुट मोटा, बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा। घटता-बढ़ता रोज़, किसी दिन ऐसा भी करता है नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज़ लिवाएँ सी दे एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आए ! (अब चाँद का जवाब सुनिए।) हंसकर बोला चाँद, अरे माता, तू इतनी भोली । दुनिया वालों के समान क्या तेरी मति भी डोली ? घटता-बढ़ता कभी नहीं मैं वैसा ही रहता हूँ । केवल भ्रमवश दुनिया को घटता-बढ़ता लगता हूंँ । आधा हिस्सा सदा उजाला, आधा रहता काला । इस रहस्य को समझ न पाता भ्रमवश दुनिया वाला । अपना उजला भाग धरा को क्रमशः दिखलाता हूँ ।...